सपोर्ट और रेज़िस्टेंस रेखा नहीं, पट्टी हैं
लोग एक पतली रेखा खींचते हैं और भाव ठीक वहाँ न मुड़े तो कहते हैं "काम नहीं आई." वह कभी रेखा थी ही नहीं.
असल में होता क्या है
जिन भावों पर कई बार पलटा है, वहाँ यादें जमा हैं — किसने वहाँ खरीदा, किसने बेचा. भाव लौटकर वहाँ आता है तो वही लोग हिलते हैं.
- सपोर्ट पट्टी — गिरने पर यहाँ खरीद आने की गुंजाइश
- रेज़िस्टेंस पट्टी — चढ़ने पर यहाँ बिकवाली निकलने की गुंजाइश
पट्टी क्यों, रेखा क्यों नहीं
कोई भी पैसे-पैसे पर सौदा नहीं करता. कुछ थोड़ा पहले हिलते हैं, कुछ थोड़ा बाद में. इसी से चौड़ाई बनती है.
दैनिक पर कुछ अंक, घंटे पर उससे कम. इसलिए बाल जैसी रेखा नहीं, हल्की पट्टी खींचिए.
टूटने पर भूमिका बदल जाती है
रेज़िस्टेंस ऊपर टूटे तो वही पट्टी अब सपोर्ट बन जाती है. भाव लौटे तो वहीं थमता है. इसे भूमिका पलटना कहते हैं.
यहीं ज़्यादातर लोग फिसलते हैं
बहुत सारी पट्टियाँ खींच देना. चार्ट पट्टियों से भर जाए तो हर भाव "किसी न किसी के पास" होता है. वह जानकारी नहीं, वॉलपेपर है.
जिन पर ज़्यादा बार छुआ है और जो हाल की हैं, बस वही रखिए. तीन लगभग हमेशा काफी हैं.
यह सीखने के लिए है, निवेश सलाह नहीं.
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